देव दर्शन के संबंधी अनेकों प्रश्नों का समाधान एक जगह
देव दर्शन के संबंधी अनेकों प्रश्नों का समाधान एक जगह :-
जैन धर्म में जैनों को श्रावक कहा गया है और श्रावक के छः कर्तव्य
बताये गये हैं- देवपूजा, गुर उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान | जिनमें देवपूजा पहला आवश्यक हैं अंतः देवपूजा / देवदर्शन प्रत्येक
श्रावक को करना चाहिए |
हमारे लिए पांचों ही परमेष्ठी पूज्य हैं जिनमे हम अरहंत परमेष्ठी की
प्रतिमा स्थापित करते हैं, क्योंकि वर्तमान में साक्षात् अरहंत भगवान का अभाव हैं | अंतः उनके जैसी आकार की प्रतिमा में
हम अरहंत भगवान की स्थापना करते हैं | और हम प्रतिदिन उनके ही दर्शन करतें हैं |
देवदर्शन से लाभ :-
1.
उनके दर्शन से हमें
उनके समान पूर्ण सुखी तथा वीतरागी होने की प्रेरणा मिलती है |
2.
उनके दर्शन से हमें
अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान होता है |
3.
अरिहंत भगवान के
उपदेश से ही हमें मोक्षमार्ग पर चलने की विधि का पता चलता है |
4.
भगवान के दर्शन से
हमारे पाप कर्मों का क्षय होता है |
5.
भगवान के दर्शन से
नवीन पुण्य कर्मों का बंधन होता है |
6.
भगवान की सौम्य
शांत मूर्ति को देखकर हमारे परिणामों में शांति उत्पन्न हो जाती है |
हमें मंदिर भगवान के दर्शन हेतु स्वच्छ – साफ (शालीन), सादे, वस्त्र पहिनकर ही जाना चाहिए, इससे हमारे परिणाम भी अच्छे रहते हैं | तथा घर से पाठ या स्तुति बोलते हुए प्रसन्न मन से मंदिर जाना चाहिए |
देव दर्शन की विधि
:-
हमें मंदिर जी
पहुंचकर जूते चप्पल उतारकर चमड़े की व अन्य खाने की वस्तुएँ बाहर रखकर, हाथ पैर धोकर मंदिरजी में प्रवेश करना
चाहिए |
फिर मंदिर जी में प्रवेश करते समय तीन बार निःसही, निःसही, निःसही बोलना चाहिए | फिर भगवान की जय-जयकार करते हुए, घंटी बजाते हुए, ॐ जय – जय – जय, नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु बोलना चाहिए | इसतरह मंदिर जी में प्रवेश करना चाहिए | फिर हाथ जोड़कर णमोकार मंत्र एवं
चत्तारी मंगल पाठ बोलकर भगवान की वेदी के सामने खड़े होकर प्रतिमा जी को निहार कर
अर्घ बोलकर चावल (द्रव्य) चढ़ाना चाहिए | फिर अष्टांग / पंचांग / गवासन में नमस्कार करना चाहिए | फिर चित्त को एकाग्र करके भगवान की
स्तुति पढ़ना व् बोलना चाहिए और स्तुति पढ़ते हुए तीन प्रदक्षिणाएँ देनी चाहिए | फिर सावधानी पूर्वक गंधोदक लगाकर चंदन
लगाना चाहिए |
फिर नौ बार णमोकार मंत्र के स्मरण पूर्वक कायोत्सर्ग करना चाहिए | उसके बाद भक्तिपूर्वक पूजन करके स्वाध्याय
(प्रवचन) में बैठना चाहिए अथवा स्वयं का स्वाध्याय करना चाहिए क्योंकि स्वाध्याय
से ही हमें पता चलता है की भगवान किस विधि से बनते हैं तथा आत्मा परमात्मा का
स्वरुप क्या है ?
फिर जो शास्त्र में पढ़ा हो अथवा प्रवचन में सुना हो उसे थोड़ी देर
बैठकर मनन करना चाहिए की मैं कौन हूँ ? भगवान कौन हैं ? मैं स्वयं भगवान कैसे बन सकता हूँ ? तथा यदि समय हो तो णमोकार मंत्र की जाप करना चाहिए एवं भगवान की तरफ
पीठ न करते हुए मंदिर जी से बाहर आना चाहिए |
विशेष :-
1.
निःसही का अर्थ :-
सर्व सांसारिक कार्यों का निषेध अर्थात् संसार की सब उलझन छोड़कर मंदिर में प्रवेश
करें |
2.
तीन प्रदक्षिणा
क्यों ?
a.
भगवान को सर्व और
से निहारने के लिये |
b.
रत्नत्रय की
प्राप्ति के लिये |
c.
परिक्रमा सदैव
बाँये से दाँयी ओर ही देना चाहिए |
d.
सभी शुभ कार्य
बाँये से दाँयी ओर बढ़ते किये जाते हैं |
e.
जीव राशि देखकर |
f.
स्तुति पाठ पढ़ते
हुए |
3.
कायोत्सर्ग :-
णमोकार मंत्र पढ़ते हुए शरीर से ममता छोड़ना |
का्य + उत्सर्ग |
4.
गंधोदक :- हमें
गंधोदक निम्न मंत्र बोलकर लगाना चाहिए –
निर्मलं
निर्मलीकरणं, पवित्रं पाप नाशनम् |
जिन गन्धोदकं वंदे, अष्ट कर्म विनाशनम् ||
अर्थ :- यह गन्धोदक
निर्मल है, निर्मल कारक है, पापनाशक है, सुखदायक है | मैं अपने अष्ट कर्म क्षयार्थ इसकी वंदना करता हूँ |
गंधोदक मात्र माथे पर लगाना चाहिए | क्योंकि शरीर का सबसे उच्च एवं पवित्र स्थान वही है | गंधोदक लगाते समय उँगलियों को इतना
गंधोदक में डुबोना चाहिए जिससे आपके नाख़ून उसमें ण डूबें जिससे आपका मैल उसमें
नहीं जा पायेगा |
5.
नमस्कार :-
1.
सर्वांग – भगवान के सामने पूर्णरूप से लेट कर समर्पण करना |
2.
अष्टांग – दो हाथ, दो पैर, मस्तक, ह्रदय, नितम्ब (पीछे का भाग), पीठ |
3.
पंचांग – दो हाथ, दो पैर, मस्त्स्क |
6.
चावल क्यों चढ़ाते
हैं ?
उत्तर – 1. भगवान के सामने खाली हाथ नहीं जाना चाहिए, चढ़ाने के लिए कम से कम चावल अवश्य
लाना चाहिए |
चावल चढ़ाने का अभिप्राय यही है की जिस प्रकार धान से छिलका उतर जाने
पर फिर उसमें उगने की शक्ति नही रहती, उसी प्रकार भगवान के दर्शन भक्ति करने में मेरी आत्मा भी संसार में
उगने यानी फिर जन्म लेने योग्य न रहे |
2. चावल धवल सफ़ेद होते हैं उसी प्रकार
आत्मा धवलता / शुद्ध्ता को प्राप्त करें इस भावना से हम चावल चढ़ाते हैं |
7.
देव दर्शन का फल :-
|
जिन प्रतिमा के
दर्शन का विचार करने से |
2 उपवास का |
|
दर्शन करने की
तयारी की इच्छा से |
3 उपवास का |
|
जाने की तैयारी
करने से |
4 उपवास का |
|
घर से जाने लगने
से |
5 उपवास का |
|
जो कुछ दूर पहुँच
जाता है उसे |
12 उपवास का |
|
जो बीच में पहुँच
जाता है उसे |
15 उपवास का |
|
जो मंदिर के
दर्शन करता है उसे |
1 माह के उपवास का |
|
जो मंदिर के आँगन
में प्रवेश करता है उसे |
6 माह के उपवास का |
|
जो द्वार में
प्रवेश करता है उसे |
1 वर्ष के उपवास का |
|
जो प्रदक्षिणा
देता है उसे |
100 वर्ष के उपवास का |
|
जो जिनेन्द्र
भगवान के मुख का दर्शन करता है उसे |
1000 वर्ष के उपवास का |
|
और जोस्वभाव से
अर्थात् निष्काम भाव से स्तुति करता है उसे |
अनंत उपवास का फल
मिलता है | |
यह जानकारी पद्मपुराण ग्रन्थ के आधार
से है |
जिनेन्द्र देव के दर्शन करने के भावों से मेंढक स्वर्ग में महा
ऋद्धिक देव हुआ |
8.
चंदन :- अभिषेक के
समय स्वयं में इंद्र की स्थापना करने के लिए जिस प्रकार इंद्र जगह आभूषण पहनते हैं
उसी तरह हमें 9 स्थानों पर चंदन लगाना चाहिए –
(1 मस्तिषक, 2 कान, 2 कलाई, 2 भुजायें, 1 नाभि, 1 गला)
9.
णमोकार मंत्र :-
णमोकार मंत्र नौ बार इसलिए पढ़ा जाता
है क्योंकि –
a.
मन, वचन, का्य को कृत, कारित, अनुमोदना से शरीर से ममत्व छोड़ने में लगाना इसप्रकार –
मन, वचन, काय (3) * कृत, कारित, अनुमोदना (3) = 9
b.
9 अखंड अंक हैं, तथा सबसे बड़ा अंक हैं, इसी प्रकार हमें भी सबसे बड़े अखंड पद की प्राप्ति करना है इसलिए
णमोकार मंत्र 9 बार पढ़ा जाता है |
10.
घंटी :-
a.
सकारात्मक सोच की उत्पत्ति
b.
देवता आदि हों तो
वे साइड में हों जायें इसलिए
c.
कुँए में बाल्टी
डालने पर उसके टकराने से लहरों के माध्यम से कचरा किनारों पर आ जाता है | ठीक उसी प्रकार घंटी बजाने पर उसमें
से तरंगें निकलती हैं वह मस्तिष्क से टकराती हैं जो मस्तिष्क के विकारों को दूर
करती हैं इसलिए घंटा बजाना चाहिए |
d.
घंटी के बजाने समय
सावधानी :-
1.
घंटी देखकर बजायें
जिससे जीव आदि की विराधना न हो |
2.
दूसरों को व्यवधान
न हो |
3.
रात्रि में घंटी
नहीं बजाना चाहिए |
पद्मावती धरणेन्द्र आदि सभी देवी – देवता मोह, राग, द्वेष, जन्म, मरण आदि दोषों से सहित हैं ; विषय कषायों में आसक्त है, साज-शृंगार, वस्त्राभूषण, अस्त्र-शस्त्र आदि आरम्भ परिग्रह से सहित हैं, हम लोग जैसे ही अल्पज्ञानी तथा दुःखी
हैं अतः ये पूज्य नहीं हैं |
जैनधर्म में संयम ही पूज्य है असंयम नहीं, देवगति के देव नियम से असंयमी होने से
पूज्य नहीं हैं |
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